श्री गणपति अथर्वशीर्ष सम्पूर्ण पाठ | Ganapati Atharvashirsha in Hindi

भगवान गणेश जी को देव गणों में प्रथम पूजने का स्थान मिला है भी अपने भक्तों का हर संकट हरते हैं. भगवान गणेश जी को प्रसन्न करने के लिए अनेकों मंत्र स्तोत्र एवं मंत्र उच्चारण किया जाता है ताकि वे अपने सभी भक्तों का दुख हर ले. इसीलिए गणपति अथर्वशीर्ष स्तोत्र (Ganapati Atharvashirsha) का पाठ करने से बहुत अधिक लाभ होता है जहां माना जाता है कि गणपत्यथर्वशीर्ष स्तोत्र का पाठ करने से सभी दुखों का अंत हो जाता है. इसके साथ ही रिद्धि सिद्धि की प्राप्ति होती है.

यह एक संस्कृत पाठ मंत्र है जो कि हिंदू धर्म में एक छोटा सा उपनिषद है यह भगवान गणेश जी को समर्पित एक उपनिषद है. श्री गणेश जी को बुद्धि प्रदान करने वाले देवताओं की श्रेणी में गिना जाता है. इस पाठ को इसे श्री गणपति अथर्व शीर्ष, गणपति अथर्वशीर्ष, गणेश अथर्वशीर्ष, या गणपति उपनिषद के रूप में भी जाना जाता है।

गणपति / गणेश

भगवान गणेश जी ने कई नामों से जाना जाता है भीम भगवान महादेव एवं माता पार्वती जी के सबसे छोटे पुत्र हैं.  गणेश जी की दो पत्नियां रिद्धि और सिद्धि है.  रिती एवं सिद्धि भगवान विश्वकर्मा जी की पुत्रियां हैं।

भगवान गणेश को सुख करता एवं  दुखहर्ता कहा जाता है उनकी कई नाम है जिनमें 12 नाम प्रमुख है –  सुमुख, एकदंत, कपिल, गजकर्णक, लंबोदर, विकट, विघ्न-नाश, विनायक, धूम्रकेतु, गणाध्यक्ष, भालचंद्र, गजानन। जब कभी भी किसी स्थान पर पूजा का विद्यारंभ किया जाता है तो भगवान गणेश को प्रथम पूजा जाता है यह विधान सदियों से चलता आ रहा है।

वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ

निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा।

गणपति अथर्वशीर्ष एक कल्याणकारी स्तोत्र

गणपति जी विघ्नहर्ता एवं शुभकर्ता करता है इनकी पूजा करने से मनुष्य जीवन में हर दुख दूर हो जाता है एवं किसी भी चीज की कमी नहीं रहती। गणपति जी की आराधना करने से घर में सुख समृद्धि एवं धन सब कुछ प्राप्त होता है रोगों का निवारण होता है दोस्त धाम सब कुछ गणपति जी हर लेते हैं. जब हमें कोई भी मांगलिक कार्य की शुरुआत करनी होती है तो गणपति जी की पूजा से ही हर कार्य शुरू होता है इनका श्लोक स्तोत्र मात्र से ही मनुष्य अपने जीवन में भगवान गणेश जी का आशीर्वाद प्राप्त कर लेता है.

ऐसा माना जाता है कि गणपति अथर्वशीर्षा का पाठ करने से भगवान गणेश अपने भक्तों की सभी कामनाएं पूरी कर देते हैं. इस स्तोत्र को बुधवार को पढ़ना बहुत ही अच्छा माना जाता है अगर आप चाहे तो आप इसे प्रतिदिन भी पढ़ सकते हैं क्योंकि स्तोत्र का जाप करने से सुख शांति प्राप्त होती है.

जब भी आप गणेश भगवान की पूजा करते हैं तो आपको हमेशा इस बात का ध्यान अवश्य रखना चाहिए कि आप दूर्वा उन्हें अवश्य अर्पित करें  दूर्वा को हाथ में ही रखें चरण या जमीन पर ना रखें क्योंकि जमीन पर रखने से भगवान गणपति जी का अपमान होता है.  और इसके अलावा भगवान गणेश जी के भोग में कभी भी तुलसी का भोग ना लगाएं क्योंकि  तुलसी को गणपति पूजा में वर्जित माना जाता है.

गजाननं भूत गणादि सेवितं, कपित्थ जम्बू फल चारू भक्षणम्।

उमासुतं शोक विनाशकारकम्, नमामि विघ्नेश्वर पाद पंकजम्।।

Ganapati Atharvashirsha in Hindi Lyrics / गणपत्यथर्वशीर्ष

।। श्री गणेशाय नम: ।।

(शान्ति-मन्त्र:)

ॐ भद्रं कर्णेभि शृणुयाम देवा:। भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्रा:।।
स्थिरै रंगै स्तुष्टुवां सहस्तनुभि:। व्यशेम देवहितं यदायु:।1।
ॐ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवा:। स्वस्ति न: पूषा विश्ववेदा:।
स्वस्ति न स्तार्क्ष्र्यो अरिष्ट नेमि:।। स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु।2।
ॐ शांति:। शांति:।। शांति:।।

श्री गणपति अथर्वशीर्ष

ॐ नमस्ते गणपतये।
त्वमेव प्रत्यक्षं तत्वमसि
त्वमेव केवलं कर्ताऽ सि
त्वमेव केवलं धर्ताऽसि
त्वमेव केवलं हर्ताऽसि
त्वमेव सर्वं खल्विदं ब्रह्मासि
त्व साक्षादात्माऽसि नित्यम्।।1।।

हिंदी अर्थ: ॐकारापति भगवान गणपति को नमस्कार है। हे गणेश! तुम्हीं प्रत्यक्ष तत्व हो। तुम्हीं केवल कर्ता हो। तुम्हीं केवल धर्ता हो। तुम्हीं केवल हर्ता हो। निश्चयपूर्वक तुम्हीं इन सब रूपों में विराजमान ब्रह्म हो। तुम साक्षात नित्य आत्मस्वरूप हो।

ऋतं वच्मि। सत्यं वच्मि।।2।।

हिंदी अर्थ: मैं ऋत न्याययुक्त बात कहता हूं। सत्य कहता हूं।

अव त्व मां। अव वक्तारं।
अव श्रोतारं। अव दातारं।
अव धातारं। अवानूचानमव शिष्यं।
अव पश्चातात। अव पुरस्तात।
अवोत्तरात्तात। अव दक्षिणात्तात्।
अवचोर्ध्वात्तात्।। अवाधरात्तात्।।
सर्वतो मां पाहि-पाहि समंतात्।।3।।

हिंदी अर्थ: हे पार्वतीनंदन! तुम मेरी (मुझ शिष्य की) रक्षा करो। वक्ता (आचार्य) की रक्षा करो। श्रोता की रक्षा करो। दाता की रक्षा करो। धाता की रक्षा करो। व्याख्या करने वाले आचार्य की रक्षा करो। शिष्य की रक्षा करो। पश्चिम से रक्षा। पूर्व से रक्षा करो। उत्तर से रक्षा करो। दक्षिण से रक्षा करो। ऊपर से रक्षा करो। नीचे से रक्षा करो। सब ओर से मेरी रक्षा करो। चारों ओर से मेरी रक्षा करो।

त्वं वाङ्‍मयस्त्वं चिन्मय:।
त्वमानंदमसयस्त्वं ब्रह्ममय:।
त्वं सच्चिदानंदाद्वितीयोऽषि।
त्वं प्रत्यक्षं ब्रह्माषि।
त्वं ज्ञानमयो विज्ञानमयोऽषि।।4।।

हिंदी अर्थ: तुम वाङ्‍मय हो, चिन्मय हो। तुम आनंदमय हो। तुम ब्रह्ममय हो। तुम सच्चिदानंद अद्वितीय हो। तुम प्रत्यक्ष ब्रह्म हो। तुम दानमय विज्ञानमय हो।

सर्वं जगदिदं त्वत्तो जायते।
सर्वं जगदिदं त्वत्तस्तिष्ठति।
सर्वं जगदिदं त्वयि लयमेष्यति।
सर्वं जगदिदं त्वयि प्रत्येति।
त्वं भूमिरापोऽनलोऽनिलो नभ:।
त्वं चत्वारिकाकूपदानि।।5।।

हिंदी अर्थ: यह जगत तुमसे उत्पन्न होता है। यह सारा जगत तुममें लय को प्राप्त होगा। इस सारे जगत की तुममें प्रतीति हो रही है। तुम भूमि, जल, अग्नि, वायु और आकाश हो। परा, पश्चंती, बैखरी और मध्यमा वाणी के ये विभाग तुम्हीं हो।

त्वं गुणत्रयातीत: त्वमवस्थात्रयातीत:।
त्वं देहत्रयातीत:। त्वं कालत्रयातीत:।
त्वं मूलाधारस्थितोऽसि नित्यं।
त्वं शक्तित्रयात्मक:।
त्वां योगिनो ध्यायंति नित्यं।
त्वं ब्रह्मा त्वं विष्णुस्त्वं
रूद्रस्त्वं इंद्रस्त्वं अग्निस्त्वं
वायुस्त्वं सूर्यस्त्वं चंद्रमास्त्वं
ब्रह्मभूर्भुव:स्वरोम्।।6।।

हिंदी अर्थ: तुम सत्व, रज और तम तीनों गुणों से परे हो। तुम जागृत, स्वप्न और सुषुप्ति इन तीनों अवस्थाओं से परे हो। तुम स्थूल, सूक्ष्म औ वर्तमान तीनों देहों से परे हो। तुम भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों कालों से परे हो। तुम मूलाधार चक्र में नित्य स्थित रहते हो। इच्छा, क्रिया और ज्ञान तीन प्रकार की शक्तियाँ तुम्हीं हो। तुम्हारा योगीजन नित्य ध्यान करते हैं। तुम ब्रह्मा हो, तुम विष्णु हो, तुम रुद्र हो, तुम इन्द्र हो, तुम अग्नि हो, तुम वायु हो, तुम सूर्य हो, तुम चंद्रमा हो, तुम ब्रह्म हो, भू:, र्भूव:, स्व: ये तीनों लोक तथा ॐकार वाच्य पर ब्रह्म भी तुम हो।

गणादि पूर्वमुच्चार्य वर्णादिं तदनंतरं।
अनुस्वार: परतर:। अर्धेन्दुलसितं।
तारेण ऋद्धं। एतत्तव मनुस्वरूपं।
गकार: पूर्वरूपं। अकारो मध्यमरूपं।
अनुस्वारश्चान्त्यरूपं। बिन्दुरूत्तररूपं।
नाद: संधानं। सँ हितासंधि:
सैषा गणेश विद्या। गणकऋषि:
निचृद्गायत्रीच्छंद:। गणपतिर्देवता।
ॐ गं गणपतये नम:।।7।।

हिंदी अर्थ: गण के आदि अर्थात ‘ग्’ कर पहले उच्चारण करें। उसके बाद वर्णों के आदि अर्थात ‘अ’ उच्चारण करें। उसके बाद अनुस्वार उच्चारित होता है। इस प्रकार अर्धचंद्र से सुशोभित ‘गं’ ॐकार से अवरुद्ध होने पर तुम्हारे बीज मंत्र का स्वरूप (ॐ गं) है। गकार इसका पूर्वरूप है।बिन्दु उत्तर रूप है। नाद संधान है। संहिता संविध है। ऐसी यह गणेश विद्या है। इस महामंत्र के गणक ऋषि हैं। निचृंग्दाय छंद है श्री मद्महागणपति देवता हैं। वह महामंत्र है- ॐ गं गणपतये नम:।

एकदंताय विद्‍महे।
वक्रतुण्डाय धीमहि।
तन्नो दंती प्रचोदयात।।8।।

हिंदी अर्थ: एक दंत को हम जानते हैं। वक्रतुण्ड का हम ध्यान करते हैं। वह दन्ती (गजानन) हमें प्रेरणा प्रदान करें। यह गणेश गायत्री है।

एकदंतं चतुर्हस्तं पाशमंकुशधारिणम्।
रदं च वरदं हस्तैर्विभ्राणं मूषकध्वजम्।
रक्तं लंबोदरं शूर्पकर्णकं रक्तवाससम्।
रक्तगंधाऽनुलिप्तांगं रक्तपुष्पै: सुपुजितम्।।
भक्तानुकंपिनं देवं जगत्कारणमच्युतम्।
आविर्भूतं च सृष्टयादौ प्रकृ‍ते पुरुषात्परम्।
एवं ध्यायति यो नित्यं स योगी योगिनां वर:।।9।।

हिंदी अर्थ: एकदंत चतुर्भज चारों हाथों में पाक्ष, अंकुश, अभय और वरदान की मुद्रा धारण किए तथा मूषक चिह्न की ध्वजा लिए हुए, रक्तवर्ण लंबोदर वाले सूप जैसे बड़े-बड़े कानों वाले रक्त वस्त्रधारी शरीर प रक्त चंदन का लेप किए हुए रक्तपुष्पों से भलिभाँति पूजित। भक्त पर अनुकम्पा करने वाले देवता, जगत के कारण अच्युत, सृष्टि के आदि में आविर्भूत प्रकृति और पुरुष से परे श्रीगणेशजी का जो नित्य ध्यान करता है, वह योगी सब योगियों में श्रेष्ठ है।

नमो व्रातपतये। नमो गणपतये।
नम: प्रमथपतये।
नमस्तेऽस्तु लंबोदरायैकदंताय।
विघ्ननाशिने शिवसुताय।
श्रीवरदमूर्तये नमो नम:।।10।।

हिंदी अर्थ: व्रात (देव समूह) के नायक को नमस्कार। गणपति को नमस्कार। प्रथमपति (शिवजी के गणों के अधिनायक) के लिए नमस्कार। लंबोदर को, एकदंत को, शिवजी के पुत्र को तथा श्रीवरदमूर्ति को नमस्कार-नमस्कार ।।10।।

एतदथर्वशीर्ष योऽधीते।
स ब्रह्मभूयाय कल्पते।
स सर्व विघ्नैर्नबाध्यते।
स सर्वत: सुखमेधते।
स पञ्चमहापापात्प्रमुच्यते।।11।।

हिंदी अर्थ: यह अथर्वशीर्ष (अथर्ववेद का उप‍‍‍निषद) है। इसका पाठ जो करता है, ब्रह्म को प्राप्त करने का अधिकारी हो जाता है। सब प्रकार के विघ्न उसके लिए बाधक नहीं होते। वह सब जगह सुख पाता है। वह पांचों प्रकार के महान पातकों तथा उपपातकों से मुक्त हो जाता है।

सायमधीयानो दिवसकृतं पापं नाशयति।
प्रातरधीयानो रात्रिकृतं पापं नाशयति।
सायंप्रात: प्रयुंजानोऽपापो भवति।
सर्वत्राधीयानोऽपविघ्नो भवति।
धर्मार्थकाममोक्षं च विंदति।।12।।

हिंदी अर्थ: सायंकाल पाठ करने वाला दिन के पापों का नाश करता है। प्रात:काल पाठ करने वाला रात्रि के पापों का नाश करता है। जो प्रात:- सायं दोनों समय इस पाठ का प्रयोग करता है वह निष्पाप हो जाता है। वह सर्वत्र विघ्नों का नाश करता है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को प्राप्त करता है।

इदमथर्वशीर्षमशिष्याय न देयम्।
यो यदि मोहाद्‍दास्यति स पापीयान् भवति।
सहस्रावर्तनात् यं यं काममधीते तं तमनेन साधयेत्।13।।

हिंदी अर्थ: इस गणपति अथर्वशीर्ष को जो शिष्य न हो उसे नहीं देना चाहिए। जो मोह के कारण देता है वह पातकी हो जाता है। सहस्र (हजार) बार पाठ करने से जिन-जिन कामों-कामनाओं का उच्चारण करता है, उनकी सिद्धि इसके द्वारा ही मनुष्य कर सकता है।

अनेन गणपतिमभिषिंचति
स वाग्मी भवति
चतुर्थ्यामनश्र्नन जपति
स विद्यावान भवति।
इत्यथर्वणवाक्यं।
ब्रह्माद्यावरणं विद्यात्
न बिभेति कदाचनेति।।14।।

हिंदी अर्थ: इस गणपति अथर्वशीर्ष द्वारा जो गणपति को स्नान कराता है, वह वक्ता बन जाता है। जो चतुर्थी तिथि को उपवास करके जपता है वह विद्यावान हो जाता है, यह अथर्व वाक्य है जो इस मं‍त्र के द्वारा तपश्चरण करना जानता है वह कदापि भय को प्राप्त नहीं होता।

यो दूर्वांकुरैंर्यजति
स वैश्रवणोपमो भवति।
यो लाजैर्यजति स यशोवान भवति
स मेधावान भवति।
यो मोदकसहस्रेण यजति
स वाञ्छित फलमवाप्रोति।
य: साज्यसमिद्भिर्यजति
स सर्वं लभते स सर्वं लभते।।15।।

हिंदी अर्थ: जो दूर्वांकुर के द्वारा भगवान गणपति का यजन करता है वह कुबेर के समान हो जाता है। जो लाजो (धानी-लाई) के द्वारा यजन करता है वह यशस्वी होता है, मेधावी होता है। जो सहस्र (हजार) लड्डुओं (मोदकों) द्वारा यजन करता है, वह वांछित फल को प्राप्त करता है। जो घृत के सहित समिधा से यजन करता है, वह सब कुछ प्राप्त करता है।

अष्टौ ब्राह्मणान् सम्यग्ग्राहयित्वा
सूर्यवर्चस्वी भवति।
सूर्यग्रहे महानद्यां प्रतिमासंनिधौ
वा जप्त्वा सिद्धमंत्रों भवति।
महाविघ्नात्प्रमुच्यते।
महादोषात्प्रमुच्यते।
महापापात् प्रमुच्यते।
स सर्वविद्भवति से सर्वविद्भवति।
य एवं वेद इत्युपनिषद्‍।।16।।

हिंदी अर्थ: आठ ब्राह्मणों को सम्यक रीति से ग्राह कराने पर सूर्य के समान तेजस्वी होता है। सूर्य ग्रहण में महानदी में या प्रतिमा के समीप जपने से मंत्र सिद्धि होती है। वह महाविघ्न से मुक्त हो जाता है। जो इस प्रकार जानता है, वह सर्वज्ञ हो जाता है वह सर्वज्ञ हो जाता है।

॥ इति श्री गणपति अथर्वशीर्ष सम्पुर्ण ॥

पाठ के लाभ

स्तोत्र का पाठ करने से बहुत सारे फायदे हैं जो कि निम्न है –

  • इस पाठ का लाभ करने से हमारे मन को शांति तथा मानसिक मजबूती मिलती है। 
  • गणपति अथर्व शीर्ष का पाठ करने से शरीर में आंतरिक शुद्धि की प्राप्ति होती है
  • बुधवार को इस पाठ का उच्चारण करने से हमारे जीवन में आने वाली सभी  रुकावटें एवं बाधाएं दूर हो जाती है
  • हमारा जीवन में स्थिरता बन जाती है
  • हमारे  दैनिक जीवन में आने वाली सभी परेशानी एवं एक विशेष प्रकार की कांति पैदा हो जाती है
  • हमारे शरीर में उत्पन्न होने वाले जहरीले तत्व बाहर आ जाते हैं
  • हमारा मन स्थिर होकर हमें हर प्रकार के निर्णय लेने के लिए मजबूर करता है.

गणपति अथर्वशीर्ष का पाठ करने की सटीक विधि

  • पाठ की शुरुआत करने से पहले आपको अपने पूजा स्थान को शुद्ध करना होगा और स्नान करके अपने पूजा के स्थान पर बैठ जाएं।
  • इसके बाद पूजा की मुद्रा में बैठते हुए अपने मेरुदंड को एकदम सीधा रखें। 
  • इस पाठ की शुरुआत करने के लिए पूजा की आवश्यकता नहीं है
  •  भगवान गणेश जी की प्रतिमा को सामने रखें।
  • माना जाता है कि इस पाठ को रोजाना करना चाहिए लेकिन बुधवार को इस पाठ का उच्चारण अवश्य करें या फिर गणेश संकष्टी चतुर्थी को इस पाठ को करना बहुत ही अच्छा माना जाता है।
  • अगर आप चाहे तो गणपति अथर्वशीर्ष का पाठ करते समय एक माला को हाथ में लेकर जपे  और ऊं गं गणपतये नम:  का उच्चारण करें।
  •  माना जाता है कि पाठ महिलाओं के लिए बहुत ही  लाभकारी होता है।

लोगों का मानना है कि गणपति अथर्वशीर्ष का पाठ अवश्य करना चाहिए क्योंकि इससे हमारे जीवन में आने वाली सभी दुख, व्यथा, पीड़ा, यातना से शांति प्राप्त होती है. जब भी आप इस पाठ का उच्चारण करें तो आप संपूर्ण सामग्री के साथ ही पूजा करें और भगवान गणपति जी को पुष्प धूप दीप अक्षत सुगंध नैवेद्य अर्पण करें। साथ ही उन्हें उनका प्रिय दुर्वा जरुर चढ़ाएं इस पूजा के लिए लाल पुष्पों का चयन करें इससे जीवन मंगलकारी हो जाता है आप इनका उच्चारण एकदम सटीक करें।

यह भी माना जाता है कि इस अथर्वशीर्ष का पाठ करने से अशुभ ग्रह की शांति होती है  जिन लोगों की जन्म कुंडली में शनि राहु केतु एवं पाप ग्रह है उनसे उनका जीवन  संकट पूर्ण रहता है इसलिए इन लोगों को इस पाठ को अवश्य ध्यान करना चाहिए ऐसा करने से ग्रह बलवान होते हैं.  यह उन बच्चों के लिए भी लाभकारी माना जाता है जिनका मन पढ़ाई लिखाई में नहीं लगता वह अपना ध्यान पढ़ाई पर केंद्रित नहीं कर पाते ऐसे छात्रों को भी गणपति अथर्वशीर्ष का पाठ अवश्य करना चाहिए।

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Ganesh Atharvashirsha By Anuradha Paudwal Ganesh Stuti

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